Transformer kitne prakar ke hote hain | ट्रांसफार्मर क्या है

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ट्रांसफार्मर क्या है(What is transformer in hindi):-

Ttansformer वह यंत्र है जो इलेक्ट्रिकल ऊर्जा को एक सर्किट से दूसरे सर्किट तक पहुंचने का काम करता है। वो भी बिना ऊर्जा हानि के। और इसमें पॉवर की फ्रीक्वेंसी भी समान होती है। transformer kitne prakar ke hote hain ये में आपको आगे बताऊंगा। इसमें पॉवर की हानि लगभग ना के बराबर होती है। क्योंकि ये यंत्र स्थिर यंत्र है इसमें कोई रोटेटिंग या मूविंग पार्ट नहीं जिससे हानि ज्यादा हो। इसीलिए transformer की दक्षता 98% होती है।

transformer kyon lagaya jata hai: (ट्रांसफार्मर का प्रयोग क्यों होता है):-

अगर हम सामान्य भाषा में कहें तो ट्रांसफार्मर एक एम्प्लीफायर के भांति व्यवहार करता है।जो किसी अन्य जगह स्थित पॉवर स्टेशन जहा पॉवर जेनरेट किया जाता है से पॉवर को अंप्लीफाई करके अधिक दूरी स्थित सबस्टेशन तक पहुंचता है।

हम ट्रांसफार्मर का प्रयोग नहीं करेंगे तो हमरा पॉवर जो कई सौ किलोमीटर दूर से हमारे घर तक आ रहा है वह नहीं आ पाएगा। अगर हम बिना ट्रांसफार्मर के पॉवर को सिर्फ तार के द्वारा कई सौ किलोमीटर दूर ले जाएंगे तो तार का impedance इतना हाई हो जाएगा कि हमरा पूरा पॉवर हमारे तार में ही हानि हो जाएगा। हमारा पॉवर लॉस उच्च लेवल पर होगा। क्योंकि impedance (resistance) बढ़ने पर करेंट का मान बढ़ जाएगा जिससे पॉवर बढ़ जाएगा। ये भी हो सकता है कि हमरा पॉवर लॉस तार में मैक्सिमम पहुंचने पर तार मेल्ट हो जाए। इसीलिए ट्रांसफार्मर के बिना पॉवर का ट्रांसमिशन संभव नहीं है।

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transformer kitne prakar ke hote hain (ट्रांसफार्मर के प्रकार):-

ट्रांसफार्मर के मुख्य रूप से वोल्टेज के आधार पर दो प्रकार के होते हैं।

1. स्टेप अप ट्रांसफार्मर (step up transformer)

2. स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर (step down transformer)

नोट:- एक isolating ट्रांसफार्मर होता है जिसके प्राइमरी और सेकंडरी दोनों कायल के टर्न बराबर होते हैं। इसे on to on transfomer भी कहते हैं। इसका उपयोग एक circuit को दो भागों में अलग करने का है।

स्टेप अप ट्रांसफार्मर(step up transformer):-

यह ट्रांसफार्मर कम वोल्टेज के पॉवर को उच्च वोल्टेज के पॉवर में परिवर्तित (change) करता है। इसका उपयोग पॉवर स्टेशन (power station) पर होता है। जो 11kv, 15kv, 27kv, के वोल्टेज जो अल्टर्नेटर से उत्पन्न होता है। उसे 400kv, और 765kv तक के वोल्टेज में परिवर्तित कर अगले सबस्टेशन तक पहुंचता है।

स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर (step down transfomer):-

स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर का उपयोग सबस्टेशन पर किया जाता है। यहां पर 400 kv के वोल्टेज की कम करके 220 kv किया जाता है । और उसके बाद इसे दूसरे सबस्टेशन पर भेजा जाता है और वहां पर 220kv को 132 केवी और 33केवी में बदला जाता है। और उसके बाद उसे 11kv में change करके उपभोक्ता ट्रांसफार्मर तक पहुंचाया जाता है।

transformer kitne prakar ke hote hain: ( उपयोगिता के आधार पर ट्रांसफार्मर के प्रकार):-

उपयोगिता के आधार पर ट्रांसफार्मर निम्न प्रकार के होते है।

1. ऑटो ट्रांसफार्मर (auto transformer)

2. पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (potantial transformer PT)

3. करंट ट्रांसफार्मर (current transformer CT)

4. कर्षण ट्रांसफार्मर (traction transformer TT)

ऑटो ट्रांसफार्मर (auto transformer):-

इसका उपयोग पॉवर ट्रांसफार्मर में इंटर कनेक्टेड ट्रांसफार्मर के रूप में किया जाता है।

पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (potential transformer):-

ये ट्रांसफार्मर इंस्ट्रूमेंट( instrument) ट्रांसफार्मर के अन्तर्गत आता है। इसका उपयोग ट्रांसमिशन लाइन हाई वोल्टेज को मापने के लिए किया जाता है।

करंट ट्रांसफार्मर(curent transformer):-

ये ट्रांसफार्मर भी instrument transfomer के अन्तर्गत आता है। इसका उपयोग ट्रांसमिशन लाइन में हाई करंट को मापने के लिए किया जाता है।

कर्षण ट्रांसफार्मर (traction transformer):-

यह ट्रांसफार्मर इलेक्ट्रिक ट्रेन में 25केवी वोल्टेज को ट्रेन को फीड करने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह 200% तक लोड 0.5 sec से लेकर 5 sec तक सहने के लिए स्पेशली डिजाइन किया जाता है।

ट्रांसफार्मर के भाग(parts of transformer in hindi):-

ट्रांसफार्मर बहुत सारे भागों से मिल कर बना होता है। और ट्रांसफार्मर के सारे भागों का अलग अलग कार्य होता है। अतः ट्रांसफार्मर के ये भाग निम्न है।

  1. कोर(core)
  2. वाइंडिंग (winding)
  3. बुशिंग (bushing)
  4. Conservator tank
  5. एक्सप्लोसिव वेंट(explosive vent)
  6. ब्रीदर (breather)
  7. बुल्क होज रिले (Bulchoz relay)
  8. रेडिएटर
  9. Cooling fan
  10. Oil
  11. Oil level indicator

कोर (core):-

Transformer का यह भाग सिलिकॉन स्टील के पत्तियों का बना होता है। इसके पत्तियों को लैमिनेटेड कर के लगाया जाता है। कोर को लैमिनेटेड करने से eddy current loss कम हो जाता है।

वाइंडिंग (winding):-

ट्रांसफार्मर का यह एक अहम भाग होता है। यह कॉपर के वायर होते है जिसको कोर पर लपेटा जाता है। ट्रांसफार्मर मे सामान्यतः दो वाइंडिंग होती है प्राइमरी वाइंडिंग तथा सेकंडरी वाइंडिंग। वाइंडिंग मे टर्न ट्रांसफार्मर के रेटिंग के हिसाब से तय किया जाता है।

बूशिंग (bushing):-

ट्रांसफॉर्मर में से निकलने वाले टर्मिनल को ट्रांसफार्मर के बॉडी से शॉर्ट होने से बचाने के लिए हम bushing का इस्तेमाल करते हैं। यह पोर्सलीन का बना होता है। जो ट्रांसफार्मर के टर्मिनल को ट्रांसफार्मर की बॉडी से अलग करता है। ट्रांसफार्मर में बुशिग ट्रांसफार्मर के वोल्टेज रेटिंग के हिसाब से अलग-अलग प्रकार के लगाए जाते हैं।

कंजर्वेटर टैंक(conservator tank):-

यह टैंक ट्रांसफार्मर मे ट्रांसफार्मर आयल के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह टैंक 100 केबी तथा इसके ऊपर के रेटिंग के ट्रांसफार्मर में प्रयोग किया जाता है। इसकी साइज ट्रांसफार्मर के रेटिंग के हिसाब से बदलती रहती है।

एक्सप्लोसिव वेंट(Explosive vent):-

कंजरवेटर टैंक के ऊपर एक पाइप लगा होता है जो नीचे की तरफ झुका होता है इसे ही एक्सप्लोसिव वेंट कहते हैं। इस वेंट में एक प्रोटेक्शन वॉल लगा होता है। जब ट्रांसफार्मर फाल्ट की स्थिति में होता है या ओवरलोड की स्थिति में होता है तो उस समय ट्रांसफार्मर बहुत ज्यादा हीट उत्पन्न करता है फल स्वरुप ट्रांसफार्मर आयल का तापमान बढ़ने लगता है।

जिसके कारण कंजरवेटर टैंक में आयल गर्म होकर वाष्प में बदलने लगता है तथा वाष्प का दबाव टैंक में बढ़ जाता है। दबाव बढ़ने पर वेंट पाइप में लगा हुआ वाल्व खुल जाता है और टैंक का प्रेशर रिलीज हो जाता है इस प्रकार टैंक के फटने का डर कम हो जाता है।

ब्रीदर(Breather):-

जैसा कि नाम से ही पता लग रहा है कि यह ट्रांसफार्मर के लिए सांस लेने का काम करता है। चुकी ट्रांसफार्मर में वायु को नमी रहित ले जाना होता है। अतः इस ब्रीदर में एक सिलिका जेल (Silica gel) नामक पदार्थ भरा रहता है जो ट्रांसफार्मर में जा रहे वायु में उपस्थित नमी को सोख लेता है तथा शुष्क वायु को ट्रांसफार्मर के अंदर जाने देता है।

ब्रीदर ने लगने वाला सिलिका जेल ब्लू कलर का होता है। जब सिलिका जेल (Silica gel) ज्यादा दिन का हो जाता है तो इसमें नमी की मात्रा अधिक हो जाती है जिसके कारण इसका कलर चेंज हो जाता है और इसका कलर चेंज होकर गुलाबी कलर का हो जाता है जिससे यह पता चलता है कि ब्रदर का सिलिका जेल खराब हो चुका है और इस प्रकार हम ब्रीदर को बदल देते हैं।

बूल्क होज रिले(buchholz relay):-

यह ट्रांसफार्मर में लगने वाला एक प्रोटक्शन डिवाइस होता है। यह रिले ट्रांसफार्मर में मेन टैंक और कंजरवेटर टैंक के बीच में लगा होता है। यह रिले गैसीय दबाव पर काम करता है। जब ट्रांसफार्मर में कोई फाल्ट या ओवरलोड की स्थिति आती है तो ट्रांसफार्मर आयल गर्म होकर वाष्प में बदलता है जिससे buchholz relay इसका पता लगा लेता है और इससे जुड़े अलार्म को बजाने लगता है।

अगर कोई अलार्म पर ध्यान नहीं देता है तो कुछ देर बाद यह सप्लाई को ट्रिप करा देता है। यह रिले बहुत बड़े साइज के ट्रांसफार्मर में जैसे कि 500 kv तथा इससे ऊपर के ट्रांसफार्मर में प्रयोग किया जाता है।

रेडिएटर(Radiator):-

रेडिएटर का काम ट्रांसफार्मर में ट्रांसफार्मर आयल को ठंडा करने का होता है। यह पतली पतली लंबी नालियों का घुमावदार संरचना में बना होता है। जो ट्रांसफार्मर के दोनों तरफ लगा होता है। जब इसमें ट्रांसफार्मर आयल जाता है तो चौकिया रेडिएटर हवा के संपर्क में होता है तथा इसके साथ-साथ इस रेडिएटर पर फाइन लगाया रहता है तो यह ट्रांसफार्मर आयल को ठंडा कर देता है।

कूलिंग फैन:-

यह कूलिंग फैन रेडिएटर को ठंडा करने के लिए लगाया जाता है। बड़े-बड़े ट्रांसफार्मरों में जापान ऑटोमेटिक होता है। जब ट्रांसफार्मर का तापमान नॉर्मल तापमान से ज्यादा बढ़ता है तो या फ्रेंड ऑटोमेटिक चलने लगता है।

ट्रांसफार्मर आयल (transformer oil):-

ट्रांसफार्मर में प्रयोग होने वाला ट्रांसफार्मर आयल ट्रांसफार्मर के कूलिंग के साथ-साथ ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग के लेमिनेशन का भी कार्य करता है। इस ऑयल की डाई इलेक्ट्रिक स्ट्रैंथ 10 kv/mm होती है।

आयल लेवल इंडिकेटर (Oil level indicator):-

ट्रांसफार्मर के कंजरवेटर टैंक में यह ऑयल लेवल इंडिकेटर लगा होता है जो टैंक में उपस्थित आयल की मात्रा को बताता है।

ट्रांसफार्मर में होने वाली टेस्टिंग (transfomer testing before use):-

दोस्तों ट्रांसफार्मर पावर ट्रांसमिशन का एक बहुत ही महंगा और महत्वपूर्ण यंत्र होता है। इसी प्रयोग से पहले एक टेस्टिंग लैब से गुजारा जाता है जिसमें निम्न प्रकार की टेस्टिंग की जाती है।

  1. ओपन सर्किट टेस्ट (open circuit test)
  2. शॉर्ट सर्किट टेस्ट (short circuit test)
  3. इंसुलेशन टेस्ट (insulation test)
  4. ट्रांसफॉर्मर ऑयल टेस्टिंग (transformer oil testing)
  5. अर्थ टेस्टिंग (earth testing)

ओपन सर्किट टेस्ट (open circuit test ):-

इसमें ट्रांसफार्मर को नो लोड पर रेटेड वोल्टेज तथा रेटेड फ्रीक्वेंसी दी जाती है। यह टेस्टिंग ट्रांसफार्मर की नो लोड पर कोर लास(core loss) करने के लिए किया जाता है।

शॉर्ट सर्किट टेस्ट (short circuit test):-

इसमें ट्रांसफार्मर के सेकेंडरी बैंडिंग को शॉर्ट कर दिया जाता है तथा प्राइमरी बैंडिंग में रेटेड वोल्टेज का 5 – 10% परसेंट वोल्टेज ही दिया जाता है। इस टेस्ट का उद्देश्य ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग का कॉपर हानि(copper loss) ज्ञात करना होता है।

इंसुलेशन टेस्टिंग (insulation testing):-

ट्रांसफार्मर में ये टेस्टिंग वाइंडिंग के इंसुलेशन की जांच करने के लिए की जाती है। इसमें वाइंडिंग का इंसुलेशन जांच करने के लिए मेगर का इस्तेमाल किया जाता है।

ट्रांसफार्मर आयल टेस्टिंग (transformer oil testing):-

इसमें ट्रांसफार्मर में प्रयोग होने वाले आयल की डाई इलेक्ट्रिक स्ट्रैंथ का मापन किया जाता है। इस टेस्टिंग में ट्रांसफार्मर आयल का डाइलेक्ट्रिक स्ट्रैंथ का मान 10 kv/mm आता है तो वह आयल ट्रांसफार्मर के लिए उचित होता है।

अर्थ कंटिन्यूटी टेस्ट (earth continuity test):-

यह टेस्टिंग ट्रांसफार्मर के installation के समय की जाती है। इसमें यह चेक किया जाता है कि ट्रांसफार्मर की बॉडी, अर्थ के वायर से उचित तरीके से कनेक्ट है या नहीं। इसमें एक साधारण सी बल्ब का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें हम मैगर या मल्टीमीटर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

Transformers कैसे काम करता है:-

सामान्यतः एक ट्रांसफार्मर में दो winding होती है प्राइमरी winding और सेकंडरी वाइंडिंग ये दोनों वाइंडिंग एक laminated आयरन कोर पर लपेटा जाता है। ये दोनों वाइंडिंग एक दूसरे से कनेक्टेड नहीं होते हैं। अतः इन दोनों वाइंडिंग के बीच का impedance अनंत होता है। ये दोनों वाइंडिंग मैगनेटिक रूप से coupled होते है। ना की electrically. अतः जब हम प्राइमरी वाइंडिंग में ac सप्लाई देते है तो सप्लाई वाइंडिंग में circulate होती है जिससे आयरन कोर में एक मैगनेटिक फ्लक्स सर्कुलेट होने लगती है चुकी सेकंडरी वाइंडिंग भी इसी कोर में लपेटी रहती है तो वह flux उस वाइंडिंग से होकर गुजरता है जिससे फैराडे के नियम के अनुसार सेकंडरी वाइंडिंग में एक emf पैदा होता है।

Transformer kitne prakar ke hote hain
ट्रांसफार्मर का diagram वोल्टेज और टर्न ratio के साथ
Chandra Mani Vishwakarma
Chandra Mani Vishwakarma

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